अहंकार पतन की छाया है, और ईश्वर-स्मरण जीवन की ज्योति।

अहंकार पतन की छाया है, और ईश्वर-स्मरण जीवन की ज्योति।

1. अहंकार का अंधकार

संसार में स्वयं को श्रेष्ठ और बलवान मानना
मनुष्य को अहंकार के अंधकार में ले जाता है।
अहंकार में डूबा व्यक्ति ईश्वर को भूल जाता है।
जब मनुष्य स्वयं को सर्वशक्तिमान समझने लगता है,
तब उसके विवेक का पतन प्रारंभ हो जाता है।
अहंकार अंततः विनाश का कारण बनता है।

2. समस्त शक्ति का मूल स्रोत ईश्वर

संसार के सभी शक्तिशाली और साहसी व्यक्ति
ईश्वर की ही कृपा से उत्पन्न हुए हैं।
बुद्धि, बल, साहस और वैभव
सब ईश्वर की देन हैं, मनुष्य की नहीं।
ईश्वर के बिना कोई भी शक्ति अस्तित्व में नहीं रह सकती।
इस सत्य को स्वीकार करना ही सच्ची विनम्रता है।

3. ईश्वर से तुलना का मोह

संसार में कोई भी व्यक्ति
ईश्वर की तुलना नहीं कर सकता।
मनुष्य सीमित है, ईश्वर असीम।
जो स्वयं को ईश्वर के समकक्ष मानता है,
वह अपने ही पतन का मार्ग चुनता है।
तुलना नहीं, समर्पण ही मोक्ष का द्वार है।

4. आराधना पर बरसती है कृपा

ईश्वर उन्हीं पर कृपा करते हैं
जो श्रद्धा और भक्ति से उनकी आराधना करते हैं।
सच्ची भक्ति मन को शुद्ध करती है।
अहंकार रहित साधना ही ईश्वर को प्रिय है।
भक्त के जीवन में संकट भी साधना बन जाते हैं।
ईश्वर भक्ति से जीवन धन्य हो जाता है।

5. गर्व से जन्म लेता विनाश

जो व्यक्ति गर्व से चूर होकर
ईश्वर की अवहेलना करता है,
वह अपने जीवन को व्यर्थ कर देता है।
अहंकार उसके कर्मों को अंधा बना देता है।
ऐसा व्यक्ति सही और गलत में भेद नहीं कर पाता।
अंततः उसे अपने प्राण तक गँवाने पड़ते हैं।

6. फतिंगा और दीपक का प्रतीक

जिस प्रकार फतिंगा दीपक की लौ की ओर
आकर्षित होकर अपनी जान गँवा देता है,
उसी प्रकार अहंकारी मनुष्य
माया और घमंड में फँसकर नष्ट हो जाता है।
बुद्धिमान वही है जो समय रहते सच को समझ ले।
ईश्वर स्मरण ही जीवन की सच्ची रक्षा है।

https://youtu.be/ghBjzmETUMg?si=uNBKdqB_Qz_DD1YD