1. ईश्वर : जीवन का सबसे निकटतम तत्व
जीवन में हमारा सबसे निकटतम तत्व स्वयं ईश्वर ही है।
हमारा प्रत्येक श्वास–प्रश्वास उनकी कृपा से ही संचालित होता है।
हम जीवित हैं, सोच सकते हैं और अनुभव कर सकते हैं—यह सब उनकी उपस्थिति का प्रमाण है।
फिर भी हम उन्हें दूर मानकर खोजते रहते हैं।
वास्तव में ईश्वर हमारे भीतर ही निरंतर विद्यमान हैं।
2. ईश्वर की खोज और मानव की भटकन
ईश्वर की खोज में मनुष्य अनेक कठिनाइयों का सामना करता है।
कभी तीर्थों में, कभी ग्रंथों में और कभी बाहरी साधनों में उन्हें ढूँढता है।
इस खोज में वह दूर-दूर तक भटक जाता है।
परंतु जिस ईश्वर को वह बाहर खोज रहा है,
वही ईश्वर उसके अपने अस्तित्व में छिपे हुए हैं।
3. अंग–अंग में बसे हुए ईश्वर
ईश्वर किसी एक स्थान तक सीमित नहीं हैं।
वे हमारे अंग–अंग, कण–कण और चेतना में व्याप्त हैं।
मन, बुद्धि और आत्मा—सबमें उनका वास है।
जब मन शुद्ध होता है, तभी उनकी अनुभूति होती है।
ईश्वर को पाने के लिए बाहर नहीं, भीतर झाँकना पड़ता है।
4. श्रद्धा और दृढ़ इच्छाशक्ति का महत्व
यदि मनुष्य की श्रद्धा अटल और इच्छाशक्ति दृढ़ हो,
तो ईश्वर-साक्षात्कार असंभव नहीं रहता।
सच्ची निष्ठा से किया गया साधन मार्ग अवश्य फल देता है।
इस जन्म में यदि लक्ष्य पूर्ण न हो पाए,
तो अगले जन्म में भी यह साधना आगे बढ़ती है।
5. ईश्वर-साक्षात्कार : जन्म–जन्म का साध्य
ईश्वर का साक्षात्कार एक क्षणिक घटना नहीं है।
यह अनेक जन्मों की साधना का परिणाम हो सकता है।
हर जन्म में किया गया सत्कर्म और साधन जुड़ता जाता है।
ईश्वर कभी भी साधक की साधना को व्यर्थ नहीं जाने देते।
अंततः साधक को अपने लक्ष्य की प्राप्ति होती है।
6. भक्ति मार्ग और ईश्वर की कृपा
भगवान को पाने के अनेक मार्ग और साधन हैं।
हर साधक का भक्ति मार्ग भिन्न होता है।
कोई ज्ञान से, कोई कर्म से और कोई प्रेम-भक्ति से चलता है।
भगवान साधक की भावना के अनुरूप ही प्रकट होते हैं।
सच्चे भाव से की गई भक्ति पर ईश्वर अवश्य कृपा करते हैं।