1. समय और प्रभु की एकता
समय की शक्ति के समान ही प्रभु की शक्ति अनंत है।
समय चलता है क्योंकि प्रभु की इच्छा कार्यरत है।
जो जन्म देता है, बढ़ाता है और अंत करता है—वह समय है।
इसलिए कहा गया है, समय ही प्रभु का स्वरूप है।
प्रभु को समझना है तो समय को समझना होगा।
2. समय ही ईश्वर का साक्षात रूप
ईश्वर किसी एक रूप में सीमित नहीं हैं।
वे समय बनकर हर क्षण उपस्थित रहते हैं।
जो दिखाई नहीं देता, पर सब कुछ चलाता है—वही ईश्वर है।
समय के बिना सृष्टि की कल्पना भी असंभव है।
इसलिए समय को ही ईश्वर कहा गया है।
3. दिन, सप्ताह, महीना और वर्ष का सृजन
ईश्वर की व्यवस्था से ही दिन और रात बने।
सप्ताह, महीना और वर्ष समय की ही इकाइयाँ हैं।
इनके माध्यम से जीवन को गति और अनुशासन मिला।
हर नया दिन प्रभु की नई कृपा लेकर आता है।
समय हमें चलना और बदलना सिखाता है।
4. चेतन और अचेतन में प्रभु की उपस्थिति
मनुष्य, पशु, पक्षी, वृक्ष—सब चेतन रूप हैं।
पर्वत, नदियाँ, पृथ्वी—सब अचेतन रूप हैं।
इन सभी में एक ही शक्ति कार्य कर रही है।
वह शक्ति प्रभु की ही अभिव्यक्ति है।
समस्त संसार उसी शक्ति से संचालित है।
5. सृष्टि का निरंतर गतिशील रहना
सृष्टि कहीं भी रुकती नहीं, वह निरंतर चलती रहती है।
पीढ़ियाँ आती हैं, पीढ़ियाँ चली जाती हैं।
पर समय और प्रभु का प्रवाह बना रहता है।
यही निरंतरता सृष्टि का नियम है।
और यही प्रभु की सबसे बड़ी लीला है।