मन का अर्पण ही सत्य का प्रथम दर्शन है

मन का अर्पण ही सत्य का प्रथम दर्शन है

1. अज्ञानरूपी अंधकार और दिव्य प्रकाश

अंधेरी काली रात्रि में जैसे बिजली की एक क्षणिक चमक सब कुछ प्रकाशित कर देती है,
वैसे ही ईश्वर-स्मरण मन के अज्ञानरूपी अंधकार को चीर देता है।
मन जब भ्रम, भय और अशांति से घिरा होता है,
तब ईश्वर के चरणों में समर्पण एक दिव्य प्रकाश बनकर प्रकट होता है।
यह प्रकाश क्षणिक होते हुए भी दिशा देने वाला होता है।

2. मन का समर्पण और चेतना का जागरण

जब मन ईश्वर को अर्पित होता है, तब अहंकार धीरे-धीरे शिथिल होने लगता है।
विचारों की उथल-पुथल शांत होकर चेतना का मार्ग प्रशस्त करती है।
इस अवस्था में मन बाहरी विषयों से हटकर भीतर की ओर प्रवाहित होता है।
समर्पण से ही आत्मबोध की पहली किरण फूटती है।
यही जागरण सत्य की ओर पहला कदम है।

3. बुद्धि में उत्पन्न विवेक का प्रकाश

ईश्वर-स्मरण केवल भाव नहीं, बल्कि बुद्धि को भी शुद्ध करता है।
अंधकारग्रस्त विचारों के बीच विवेक का प्रकाश उदित होता है।
सही और गलत का भेद स्पष्ट होने लगता है।
निर्णय में स्थिरता और जीवन में स्पष्टता आती है।
यही विवेक मनुष्य को सत्य के पथ पर ले जाता है।

4. सत्य के मार्ग का दिव्य मार्गदर्शन

क्षणिक प्रकाश भी यात्री को दिशा दिखा देता है।
इसी प्रकार ईश्वर-कृपा जीवन के जटिल मार्ग में संकेत देती है।
यह मार्गदर्शन शब्दों में नहीं, अनुभूति में उतरता है।
अंतरात्मा की आवाज़ स्पष्ट होने लगती है।
और जीवन उद्देश्यपूर्ण बन जाता है।

5. साकार और निराकार—भक्ति की एकता

कोई ईश्वर को साकार रूप में पूजकर निकटता अनुभव करता है,
तो कोई निराकार चेतना में ईश्वर का साक्षात्कार करता है।
रूप भिन्न हो सकते हैं, पर भाव एक ही होता है।
भक्ति का लक्ष्य बाहरी नहीं, आंतरिक परिवर्तन है।
अंततः सभी मार्ग उसी एक सत्य की ओर जाते हैं।

https://youtu.be/ghBjzmETUMg?si=SZ0dciN69uhHiUnd