1. प्रेम एवं भक्ति का दिव्य स्वरूप
प्रेम और भक्ति वह पवित्र मार्ग हैं जो भक्त के हृदय को ईश्वर से जोड़ते हैं।
जब प्रेम निष्कलुष होता है और भक्ति निःस्वार्थ, तब आत्मा परमात्मा की ओर सहज ही आकर्षित होती है।
ऐसे भक्त संसारिक बंधनों से ऊपर उठकर केवल ईश्वर में ही आनंद खोजते हैं।
उनका जीवन स्वयं एक साधना बन जाता है।
2. प्रेम रूपी ताना और भक्ति रूपी बाना
प्रेम रूपी ताना और भक्ति रूपी बाना से आस्था का वस्त्र बुना जाता है।
यह वस्त्र भक्त की आत्मा को ढककर उसे अहंकार और भय से मुक्त करता है।
इस आस्था में डूबा भक्त अपने प्रत्येक कर्म को ईश्वर को समर्पित कर देता है।
यही समर्पण उसके जीवन को पवित्र बनाता है।
3. आस्था से उत्पन्न समर्पण भाव
सच्ची आस्था भक्त के भीतर पूर्ण समर्पण का भाव उत्पन्न करती है।
वह अपने सुख-दुःख, लाभ-हानि सभी को ईश्वर की इच्छा मानकर स्वीकार करता है।
ऐसे भक्त के मन में कोई द्वेष या अपेक्षा नहीं रहती।
उसका हृदय सदा ईश्वर-स्मरण में लीन रहता है।
4. ईश्वर की कृपा की प्राप्ति
जो भक्त प्रेम और भक्ति के मार्ग पर दृढ़ रहता है, उस पर ईश्वर की कृपा अवश्य होती है।
कृपा से उसके जीवन की कठिनाइयाँ सरल हो जाती हैं।
ईश्वर उसकी रक्षा स्वयं करते हैं और उसे सही मार्ग दिखाते हैं।
भक्त का विश्वास और भी गहरा हो जाता है।
5. कृपा रूपी वृक्ष की छाया में जीवन
ईश्वर की कृपा एक विशाल वृक्ष के समान होती है।
उसकी छाया में भक्त को शांति, सुरक्षा और संतोष प्राप्त होता है।
वह संसार के ताप से मुक्त होकर आत्मिक आनंद में निवास करता है।
ऐसा जीवन ही सच्चे भक्ति-मार्ग की पूर्णता है
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