कर्तव्य ही जीवन है।

कर्तव्य ही जीवन है।

1. जीवन का प्रथम कर्तव्य

जीवन का आरंभ माँ के स्तनपान से होता है।
यह केवल पोषण नहीं, बल्कि जीवन को स्वीकार करने की प्रक्रिया है।
शिशु का स्तनपान करना उसका पहला कर्तव्य है।
इसी से उसके शरीर और प्राण सुरक्षित रहते हैं।
यह प्रकृति द्वारा दिया गया पहला धर्म है।

2. शिशु का मौन धर्म

छोटा सा शिशु बोल नहीं सकता, पर कर्म करता है।
स्तनपान करके वह अपने जीवन की रक्षा करता है।
यह उसका मौन तप और साधना है।
यदि वह यह कर्म न करे, तो जीवन संभव नहीं।
इसलिए यह भी एक महान कर्तव्य है।

3. कर्तव्य से ही जीवन की निरंतरता

जीवन कर्तव्यों की शृंखला से चलता है।
हर अवस्था में अलग-अलग धर्म होते हैं।
शिशु का धर्म जीवन को थामे रखना है।
यही कर्तव्य आगे चलकर संस्कार बनता है।
कर्तव्य जीवन को दिशा देता है।

4. आध्यात्मिक दृष्टि से कर्तव्य

आध्यात्म में कर्तव्य को धर्म कहा गया है।
धर्म का पालन ही जीवन का आधार है।
स्तनपान भी धर्म का ही एक रूप है।
यह प्रकृति और ईश्वर की व्यवस्था है।
इसे निभाना जीवन का सम्मान है।

5. जीवन के अंत तक कर्तव्य का महत्व

जैसे जन्म में कर्तव्य आवश्यक है।
वैसे ही जीवन के हर चरण में।
कर्तव्य से ही मानव पूर्ण बनता है।
कर्तव्य त्यागने पर जीवन भटक जाता है।
अंत तक कर्तव्य ही जीवन का सार है।