प्राण की महिमा

प्राण की महिमा

१. प्राण क्या है

‘प्राण’ केवल श्वास या हवा नहीं है।
यह जीवन की चेतन शक्ति है — वह ऊर्जा जो शरीर, मन, और बुद्धि को गतिशील रखती है।
प्राण ही वह अदृश्य शक्ति है जो वृक्ष को बढ़ाती है, पक्षी को उड़ाती है, मनुष्य को सोचने और अनुभव करने की क्षमता देती है।

संस्कृत में ‘प्राण’ का अर्थ है —

“प्रकृष्ट रूपेण अनिति” अर्थात् “जो सबको गतिशील रखता है”।

२. प्राण में ईश्वर का वास क्यों कहा गया है?

ईश्वर कोई बाहरी सत्ता नहीं, बल्कि वही अनंत चेतना है जो समस्त अस्तित्व में व्याप्त है।
प्राण उसी चेतना का चलायमान रूप है —
जैसे विद्युत शक्ति बल्ब में प्रकाश बनकर प्रकट होती है, वैसे ही ईश्वर प्राण बनकर जीवन में प्रकट होता है।

जब प्राण शुद्ध, संतुलित और जागरूक होता है —
तो ईश्वर की उपस्थिति भीतर अनुभव होने लगती है।

इसलिए कहा गया —
“प्राण के भीतर ईश्वर है।”

३. प्राण ही ईश्वर है — इसका गूढ़ अर्थ

जब हम ध्यान में बहुत सूक्ष्म स्तर पर उतरते हैं, तो अनुभव होता है कि
श्वास मात्र हवा नहीं, बल्कि चैतन्य की तरंग है।
उस तरंग में जीवन, ज्ञान और प्रेम — तीनों का स्रोत छिपा है।
वह स्वयं में दिव्यता का स्वरूप है।

इसलिए —
“प्राण ही ईश्वर है” कहा गया।
क्योंकि ईश्वर वही चेतना है जो प्राण के रूप में भीतर प्रवाहित हो रही है।

४. परन्तु प्राण ही ईश्वर नहीं है — यह क्यों कहा गया?

यह वाक्य बहुत सूक्ष्म भेद को बताता है।

प्राण ईश्वर का एक अभिव्यक्त रूप है —
जैसे तरंग सागर का एक रूप है,
पर तरंग को सागर नहीं कहा जा सकता।

उदाहरण:

पानी से बुलबुला उत्पन्न होता है।
बुलबुला पानी का ही रूप है,
परन्तु बुलबुला ही पानी नहीं है।

इसी प्रकार —
प्राण, ईश्वर से उत्पन्न है;
ईश्वर की ही चेतना उसमें प्रवाहित है;
पर ईश्वर केवल प्राण तक सीमित नहीं है।

ईश्वर उस प्राण के भी पार है —
वह मौन, निराकार, अनंत सत्ता है
जहां प्राण, मन, और विचार सब लीन हो जाते हैं।

५. आध्यात्मिक अर्थ में

प्राण साधना का उद्देश्य प्राण को ईश्वर से जोड़ना है —

“प्राण से पार जाना — वहीं आत्मसाक्षात्कार है।”

जब साधक प्राण को शांत, शुद्ध और साक्षी बनाता है,
तो वह उस चेतना को अनुभव करता है जो प्राण के भी पार है।
वहीं परमात्मा का साक्षात्कार होता है।

६. निष्कर्ष

प्राण — जीवन की गति है।

ईश्वर — उस गति का स्रोत है।

प्राण ईश्वर का रूप है, पर ईश्वर केवल प्राण नहीं है।

प्राण के माध्यम से ईश्वर की अनुभूति संभव है,
पर ईश्वर प्राण से भी अनंत और व्यापक है।


 सारांश वाक्य:

“प्राण ईश्वर का द्वार है।
प्राण में उतरना ईश्वर की ओर बढ़ना है।
परंतु ईश्वर प्राण के पार — मौन और अनंत में विराजमान है।”